लखनऊ दवाएं जीवन बचाने के लिए होती हैं मगर कभी-कभी यही दवाएं बेहद खतरनाक परिणाम भी दे देती है। ऐसी ही एक दवा थी थैलिडोमाइड जिसने दुनिया के लगभग 48 देशों में बड़ी त्रासदी की। स्टेट फार्मेसी काउंसिल उत्तर प्रदेश के पूर्व चेयरमैन एवं फार्मेसिस्ट फेडरेशन के अध्यक्ष सुनील यादव बताते हैं कि थैलिडोमाइड ट्रेजेडी को 20वें शताब्दी के वर्ष 1950 से 1960 दशक की सबसे बड़ी चिकित्सा त्रासदी माना जाता है। गर्भवती महिलाओं में थैलिडोमाइड को जर्मनी की दवा कंपनी ने मॉर्निंग सिकनेस और उल्टी रोकने के लिए प्रस्तुत किया था। दवा कंपनी द्वारा इसे गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित
और गैर-नशे की दवा के रूप में प्रचारित किया गया। थैलिडोमाइड जल्दी ही यूरोप, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, और अन्य देशों में लोकप्रिय हो गई और लगभग 46 देशों में बेची जाने लगी। लेकिन बाद में पाया गया कि लगभग 10000 से अधिक ऐसे शिशु पैदा हुए जिनमें फोकोमेलिया पाया गया। इस बीमारी में में नवजात शिशुओं
के अंग या तो पूरी तरह से विकसित नहीं होते थे या बहुत छोटे होते थे। कई बच्चों के हाथ और पैर विकृत हो जाते थे या उनमें हड्डियों का विकास ठीक से नहीं हो पाता था। अन्य शारीरिक विकृतियाँ जैसे कि हृदय, गुर्दे, और नेत्र दोष भी देखे गए। जिन बच्चों को ये समस्याएं हुईं, उनमें से अधिकांश या तो मर गए या फिर गंभीर रूप से
दिव्यांग हो गये। इस घटना के कारण, दुनिया भर में फार्माकोविजिलेंस (दवाओं की निगरानी और सुरक्षा) की आवश्यकता को मान्यता दी गई। भारत में भी 2010 से यह व्यवस्था शुरू कर दी गई। अब आयुष विभाग ने भी आयुर्वेदिक औषधियों का भी एडीआर रिपोर्ट शुरू कर दिया है। बहरहाल अब पहले जैसी स्थितियां नहीं। अब हर दवा के बारे में जाना जा सकता है। वह भी घर बैठे बिल्कुल आसान तरीके से। यदि कोई भी दवा गलत प्रतिक्रिया देती है तो टोल फ्री नंबर 1800-180-3024 या पीवीपीआई ऐप पर रिपोर्ट करिए। इसमें आपको अपनी दवा के बारे में तो जानकारी मिलेगी ही साथ ही साथ उस दवा के साइड इफेक्ट पर भी पूरा ब्यौरा खंगाला जायेगा।
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