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गोभी की खेती का महिमामंडन मनोवैज्ञानिक भय अभियान का हिस्सा:पी. जे. जेम्स


 

लखनऊ भाजपा की अभूतपूर्व बिहार चुनाव जीत के संदर्भ में, असम के मंत्री और भाजपा नेता अशोक सिंघल की कुख्यात टिप्पणी—“बिहार ने गोभी की खेती को मंज़ूरी दे दी”—और उसके साथ एक फूलगोभी खेत की तस्वीर—तेज़ी से फैल रही बहस और व्यापक निंदा का कारण बनी है। यह पोस्ट 14 मई को उस समय की गई थी, जब बिहार विधानसभा चुनाव की गिनती चल रही थी और रूझानों में चुनाव आयोग के फासीवादी औजार SIR के प्रभावी इस्तेमाल के बाद सत्ता में बैठी “डबल इंजन” सरकार की जीत सुनिश्चित दिख रही थी।

 

“फूलगोभी की तस्वीर” जिसका इस्तेमाल अक्सर हिंदुत्व फासीवादी करते हैं, वास्तव में 1989 के भागलपुर में मुसलमानों के खिलाफ हुई व्यापक हिंसा के सबसे भयावह और बर्बर हिस्से—लोगैं हत्याकांड—का संदर्भ है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल 1070 मौतों में से 90% से अधिक मुसलमान थे। लोगैं नरसंहार में 116 मुसलमानों—जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी थे—की लाशों को एक खेत में दफना दिया गया था और बाद में उन पर सबूत मिटाने के लिए गोभी के पौधे लगा दिए गए थे। यही वजह है कि “फूलगोभी जनसंहार” भागलपुर हिंसा का सबसे स्पष्ट और प्रतीकात्मक चिन्ह बन गया।

 

दरअसल, 1989 का भागलपुर जनसंहार आरएसएस की लगातार, सुनियोजित और तेज़ होती उस गति की शुरुआत थी, जिसका अंतिम उद्देश्य हिंदूराष्ट्र की स्थापना है। भागलपुर की यह हिंसा राम जन्मभूमि अभियान से जुड़ी थी, जिसे आरएसएस से संबद्ध विहिप ने “रामशिला रैली” के रूप में चलाया था, जिसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ईंटें इकट्ठा करना था। सच यह है कि इसी राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान, पूरे भारत में कई दंगे और जनसंहार आयोजित किए गए थे। इस राष्ट्रव्यापी अभियान ने जनता के भीतर अभूतपूर्व सांप्रदायिक तनाव और ध्रुवीकरण पैदा किया।

 

उदाहरण के लिए, अक्टूबर 1989 में भागलपुर के मुस्लिम बहुल इलाक़ों से गुजरते रामशिला जुलूस में खुलेआम भड़काऊ नारे लगाए गए—जैसे: “भारत हिंदुओं का है, मुल्लों पाकिस्तान जाओ!” इसी घृणा अभियान ने वह माहौल बनाया जिसने भारत में मुसलमानों के खिलाफ सबसे बड़े जनसंहारों में से एक को संभव किया। तभी से “गोभी की खेती” शब्द का इस्तेमाल न केवल सड़क छाप गुंडों द्वारा बल्कि कट्टर हिंदुत्व हलकों में भी मुसलमानों को अपमानित करने और धमकाने के लिए किया जाने लगा।

 

उदाहरण के लिए, मार्च 2025 के नागपुर हिंसा को लें। जैसा कि व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया, बजरंग दल जैसी आतंकवादी हिंदुत्व गिरोह और विहिप जैसे उग्र संगठनों ने औरंगज़ेब की कब्र तोड़ने की मांग के बहाने हिंसक अभियान शुरू किया। इसी दौरान हिंदुत्व सोशल मीडिया हैंडल्स ने फूलगोभी की तस्वीरें साझा कीं, मानो मुसलमानों से जुड़े मुद्दों का “समाधान” भागलपुर जैसे रक्तपात में ही है। एक ट्विटर हैंडल ने उस समय एक महिला को फूलगोभी तोड़ते दिखाती तस्वीर के साथ लिखा था—“नागपुर के पास हल है।”

 

और यह केवल मुसलमानों के खिलाफ ही नहीं। आज भाजपा और पूरा संघ परिवार अपने हर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर “जीत” के जश्न में भी “फूलगोभी” का प्रतीक इस्तेमाल कर रहा है। इसका एक ताज़ा उदाहरण है 23 मई 2025 को कर्नाटक भाजपा के ट्विटर अकाउंट से पोस्ट की गई एआई-जनित छवि, जिसमें अमित शाह एक फूलगोभी पकड़े खड़े हैं और सामने एक कब्र-नुमा पत्थर पर लिखा है—“नक्सलवाद को श्रद्धांजलि”।

इसलिए, “फूलगोभी” को फासीवादी जीत के प्रतीक के रूप में मनाना कोई इत्तफाक या मज़ाक नहीं है। यह भारतीय फासीवाद—जिसका नेतृत्व दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी फासीवादी संस्था आरएसएस कर रही है—की अंतर्निहित क्रूरता और भयावहता को उजागर करता है। इस दृष्टि से, अशोक सिंघल—जो कि भाजपा के नेता और मंत्री हैं—की पोस्ट “बिहार ने गोभी की खेती को मंज़ूरी दे दी” अल्पसंख्यक मुसलमानों और राजनीतिक विरोधियों पर किए गए फासीवादी अत्याचारों का खुला समर्थन है।

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