भाजपा सरकार में संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल, लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता : अनिल यादव
पूर्व सदस्य, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा— लोकतंत्र में संस्थाओं का काम सत्ता के दबाव से मुक्त होकर संविधान और कानून के अनुसार कार्य करना है, तभी जनता का विश्वास कायम रहेगा।
लखनऊ। समाजवादी विचारधारा से जुड़े पूर्व सदस्य राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार अनिल यादव ने भाजपा सरकार में विभिन्न संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वतंत्र कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि देश की सभी संवैधानिक संस्थाएं कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह हैं।
अनिल यादव ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, न्याय और सम्मान की गारंटी देता है। संविधान की भावना के अनुसार सरकारी संस्थाओं को किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति या सत्ता के प्रभाव से ऊपर उठकर काम करना चाहिए। लेकिन भाजपा सरकार के कार्यकाल में संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर लगातार सार्वजनिक बहस और सवाल सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि संस्थाओं की कार्यप्रणाली पारदर्शी हो और उनके प्रत्येक निर्णय में निष्पक्षता दिखाई दे।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी सरकार की। विपक्ष जनता की समस्याओं को उठाता है, सरकार से सवाल पूछता है और जनहित के मुद्दों पर जवाबदेही सुनिश्चित करता है। यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास कमजोर होता है, तो इसका प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार आलोचनाओं को लोकतंत्र का हिस्सा समझे और संस्थाओं की स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
अनिल यादव ने कहा कि चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, संवैधानिक आयोगों और अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं से जनता को निष्पक्षता की अपेक्षा रहती है। इन संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी सरकार की उपलब्धि या विफलता से बड़ी होती है, क्योंकि इनका संबंध देश के लोकतांत्रिक भविष्य और नागरिकों के अधिकारों से है। संस्थाओं की निष्पक्षता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि उनके कामकाज और निर्णयों में भी दिखाई देनी चाहिए।
उन्होंने सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कहा कि पिछड़े, दलित, वंचित, शोषित और कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बेहद जरूरी है। जब इन वर्गों को न्याय, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और समान अवसरों से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखने का अवसर मिलता है, तभी संविधान में निहित समानता का उद्देश्य पूरा होता है। सामाजिक न्याय केवल एक नारा नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना है।
उन्होंने कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से देश को समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय का रास्ता दिखाया था। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास दिया कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता नहीं होना चाहिए।
अनिल यादव ने आगे कहा कि सत्ता आती-जाती रहती है, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाएं देश की स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होती हैं। किसी भी सरकार का मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि उसने संस्थाओं की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक परंपराओं को कितना महत्व दिया।
अंत में उन्होंने कहा कि आज देश को ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता है, जहां संस्थाएं स्वतंत्र हों, कानून सबके लिए समान हो, युवाओं को रोजगार मिले, किसानों को सम्मान मिले और PDA समाज सहित सभी वंचित वर्गों को उनका संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो। लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता में नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के विश्वास में होती है
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